जब ‘मैं’ मिटता है, तभी शुरू होता है असली ‘रामराज्य’ – आत्मचिंतन का संदेश

जब ‘मैं’ मिटता है, तभी शुरू होता है असली ‘रामराज्य’ – आत्मचिंतन का संदेश

महाराष्ट्र Vijaykumar Katti

आज के दौर में जहां मंचों की चमक-दमक और बाहरी दिखावा हमारी सोच पर हावी होता जा रहा है, वहीं एक गहरा आत्मिक संदेश हमें भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है। यह केवल करने या दिखाने की बात नहीं है, बल्कि अपने अंदर के खालीपन से उपजे उस ‘साक्षात्कार’ की ओर इशारा करता है, जो हमें वास्तविक शांति और सत्य के करीब ले जाता है।
यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जीवन का असली अर्थ बाहरी सफलता या प्रशंसा में नहीं, बल्कि अपने भीतर की आवाज़ को सुनने में है। जब हम अपने अहंकार, अपने ‘मैं’ को पीछे छोड़ देते हैं, तभी हमारे अंदर एक नई शुरुआत होती है।
यह एक आह्वान है—आज केवल मंच पर हो रही चमक को देखने की बजाय, अपने अंतरमन की ‘विणे’ की तारों को छेड़ने का। जब व्यक्ति अपने भीतर उतरता है, तब उसे सच्ची अनुभूति होती है, जहां कोई दिखावा नहीं, केवल शांति और सच्चाई होती है।
यही वह अवस्था है, जहां ‘मैं’ समाप्त होता है और एक व्यापक, समर्पित और संतुलित जीवन की शुरुआत होती है। इसी बिंदु से सच्चे ‘रामराज्य’ का उदय होता है—एक ऐसा राज्य जो बाहर नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के भीतर बसता है।

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