अक्षय तृतीया स्वयं सिद्ध मुहूर्त है – धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास
प्रतापगढ़ । 14 मई दिन शुक्रवार को अक्षय तृतीया है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) आश्विन शुक्ल दशमी (विजयदशमी) कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा ए चारों मुहूर्त स्वयं सिद्ध मुहूर्त है इनमें किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्ध देखने की आवश्यकता नहीं है। इसमें प्रथम तीन मुहूर्त पूर्ण बली तथा चौथा अर्ध बली होने से यह साढ़े तीन स्वयं सिद्ध मुहूर्त कहलाते हैं। शुभ मुहूर्त में कार्य करने से जन्म के ग्रह भी बदल जाते हैं। ज्योतिष स्मृति के कथनानुसार शुभ समय में कर्तव्य पालन करने से पुण्य उत्पन्न होता है वह पुण्य पूर्व जन्म के अशुभ फल का नाश कर शुभ फल करता है। यही मुहूर्त में काम करने का मुख्य उपयोग है ,मनमाने निषिद्ध समय में काम करने से शुभ फल तो मिलता ही नहीं पाप मात्र होता है। वेद जिसे करो कहता है वह विधि है तथा जिसे मत करो कहता है वह निषेध है। भगवान परशुराम का जन्म वैवस्वतमन्वंतर में अर्थात सतयुग के अंतिम चरण में हुआ जो चाक्षुष मन्वंतर कहा जाता है ।वह वैशाख मास के शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) के पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च के 6 ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु के स्थित रहते हुए अवतरित हुए थे ।वैशाख वर्ष का सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशाई भगवान शिव को भी सदा प्रिय है। सभी दानों में जो पुण्य होता है और सब तीर्थों में जो फल होता है। उसी को मनुष्य वैशाख मास में केवल जल दान देकर प्राप्त कर लेता है। वैशाख में तेल लगाना दिन में सोना कांसे के पात्र में भोजन करना खाट पर सोना घर में नहाना निषेध पदार्थ खाना दोबारा भोजन करना तथा रात में खाना यह 8 बातें त्याग देनी चाहिए, ऐसा स्कंद पुराण में आया है। इस तरह अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर भगवान श्रीमन्नारायण ने माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के घर राम का अवतार हुआ किंतु परशु धारण करने के कारण आपका नाम परशुराम पड़ा। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन शस्त्र धारियों में मैं राम हूं अर्थात परशुराम हूं। अक्षय तृतीया का पर्व बसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है। विष्णु धर्मसूत्र मत्स्य पुराण नारदीय पुराण तथा भविष्य आदि पुराणों में इसका विस्तृत वर्णन है। सामान्यता अक्षत के द्वारा भगवान विष्णु का पूजन निषिद्ध है मात्र अक्षय तृतीया के दिन अक्षत से विष्णु की पूजा करने का विधान है। ऐसा मत्स्य पुराण में आया है। स्कंद पुराण कहता है कि लोक में अक्षय तृतीया की महिमा सर्वविदित है वास्तव में पूरा वैशाख मास ही परम पवित्र माना जाता है। गंगा जमुना नर्मदा गोमती नदियों, समुद्र में आज के दिन स्नान कर दिया हुआ दान अक्षय माना गया है। यदि किसी कारण बस इन पवित्र नदियों में जाकर दान नहीं कर सकते हैं तो गंगाजल का अपने ऊपर छिड़काव करें गंगाजल का पान करें ब्राम्हण को जल से भरा हुआ घड़ा तथा दक्षिणा आदि दान करें। उक्त जानकारी दासानुदास ओमप्रकाश पाण्डेय अनिरुद्ध रामानुज दास रामानुज आश्रम संत रामानुज मार्ग प्रतापगढ़ ने दिया ।